Monday, April 6, 2026
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CG:एक हाथी मारने की कीमत 8 लाख…सौदा तय करो,48 घण्टे में पूरा वन हाथी विहीन कर देंगे…


0 हाथियों के उत्पात से बढ़ती परेशानी और आक्रोश में फंसी जान 0 अनेक जनप्रतिनिधि ठेकेदारी में मस्त तो विरोध कैसे करें गलत कार्यों का,फायदा उठा रहे वन अधिकारी
कोरबा(खटपट न्यूज़)। कटघोरा वन मंडल के पसान रेंज के ग्राम बनिया के एक खेत में हाथी के बच्चे की मौत के बाद जांच-पड़ताल के दौरान एक वीडियो सोशल मीडिया में तेजी से वायरल हो रहा है। वायरल वीडियो के बारे में कहा जा रहा है कि यह क्षेत्र के जनपद सदस्य कोमल सिंह (कमलभान) का है जो कि हाथी के बच्चे की मौत/हत्या के मामले में आरोपी बनाया गया है।

कई सवाल छोड़ गया नन्हा हाथी

वायरल वीडियो में काफी आक्रोशित और तेज आवाज में वन विभाग के कर्मियों के सामने कहा जा रहा है कि हम मरेंगे या मारेंगे। हाथी हमारा घर तोड़ रहे हैं तो हम भी हाथी को मारेंगे। हाथी से एक आदमी के मरने पर आप लोग (वन विभाग) 6 लाख रुपए देते हो, हम एक हाथी को मारोगे तो 8 लाख रुपए का चंदा करके देंगे आपको, सौदा तय करो। हमको 48 घंटा का समय दीजिए, पूरा वन हाथी विहीन कर देंगे। व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा कि आप लोग कहते हो कि वन काटते हो, जंगल उजाड़ते हो तो हाथी कहां जाएगा? तो क्या फॉरेस्ट लैण्ड में वन विभाग का कोई दफ्तर बना है, क्यों वन विभाग के दफ्तर रेवेन्यू (राजस्व)की जमीन पर बनाए हो, अपना ऑफिस जंगल में क्यों नहीं बनाते? पिछले 60 साल से यही दुर्दशा क्षेत्र में झेल रहे हैं। किसानों का दुर्गति हो गया है। बैंक से कर्ज लेकर बीज खरीदकर खेती-बाड़ी करते हैं और उसको हाथी उजाड़ देता है। किसान का कर्जा कौन पटाएगा, लास्ट में किसान को आत्महत्या करना पड़ जाता है। हमको हमारे हाल पर छोड़ दो।
0 जनप्रतिनिधि मौन, विभाग के पास कोई योजना नहीं
हाथियों के कारण बढ़ती समस्या से कृषक वर्ग ज्यादा परेशान है। उसके द्वारा मेहनत कर खेती-बाड़ी की जाती है। कर्ज लेकर चाहे वह निजी कर्ज हो या बैंक का कर्ज, फसल लगाता है लेकिन जब उसी फसल को हाथी बेदर्दी से रौंदते हैं तो किसानों का सीना छलनी हो जाता है। उस फसल की आवक के बलबूते ही उस किसान का पूरा परिवार पलता है,बच्चों की पढ़ाई, स्वास्थ्य से लेकर सारी सुविधाएं उसी फसल की आमदनी के बूते रहती है।किसान दहशत में है, ग्रामीण आंसू बहा रहे हैं लेकिन वन विभाग के स्थानीय से लेकर बड़े स्तर के अधिकारियों, बड़े-बड़े नेताओं तक यह क्रंदन आखिर क्यों नहीं पहुंच पा रहा। सरकार का धन, डीएमएएफ की राशि कैम्पा मद की राशि घटिया, बेवजह और आधे-अधूरे निर्माण कार्यों के भ्रष्टाचार में डुबा दी जा रही है। वन विभाग में कमीशन खोरी हावी है, योजना फलीभूत नहीं हो रही तो आखिर जंगली जानवरों को लाभ कैसे मिलेगा? हाथी को मारना और दफना देना एक बहुत बड़ी घटना है जो नहीं होना चाहिए। आरोपियों को पकड़ना विभाग की एक प्रक्रिया है लेकिन इस तरह की नौबत क्यों आई, ग्रामीण इतने उग्र क्यों हो रहे हैं, वन विभाग यह सब रोक पाने में सफल क्यों नहीं हो रहा, इस घटना को सबक मानकर ऐसी घटना की पुनरावृत्ति ना हो व इस पर गहन मंथन करना जरूरी है।
0 ठेकेदारी का लाभ तो दबाव कैसे,सदन तक को गुमराह कर दिया
कोई माकूल व्यवस्था क्यों नहीं की जाती कि हाथी अपने रहवास क्षेत्र में रहें। क्या जनप्रतिनधियो के पास इतनी फुर्सत नहीं कि वे हाथी की समस्या से निपटने के लिए पूरी इच्छाशक्ति के साथ काम करवाएं। वैसे यह जाहिर है कि कोरबा औऱ कटघोरा वनमंडल में अनेक जनप्रतिनिधि स्वयं या फिर उनके लोग वन विभाग में ठेकेदारी कर रहे हैं तो विभाग के गलत कार्यों का भी वे विरोध नहीं कर पाते। अपने नियोक्ता को गलत जानकारी देकर गुमराह कर देते हैं तो भला भ्रष्ट अधिकारी/कर्मचारी का मनोबल कैसे न बढ़े। अधिकारी तो इतने निरंकुश हो गए कि विधानसभा में भी झूठी जानकारी देने लगे हैं और कोई कार्यवाही तक नहीं होती।
0 जंगल में बढ़ता दखल रोकने की जरूरत
बल और संसाधनों की कमी से जूझ रहे वन विभाग के अधिकारियों के पास कोई अनुभव, कोई ठोस कार्ययोजना अभी भी दूर-दूर तक नजर नहीं आती कि वह हाथियों के कदम गांव की ओर बढ़ने से रोक सकें। जंगलों में फलदार पौधों का रोपण,पानी के पर्याप्त संसाधन का भी अभाव बना हुआ है। जिस तरह से जंगलों के भीतर इंसानों की दखल अपनी मकान संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए बढ़ रही है और वन भूमि पर काबिज लोगों को पट्टा देने की योजना का गैर जरूरतमंद भी फायदा उठाने के लिए जिस तरह से वनों को अतिक्रमित कर रहे हैं, जंगलों के भीतर लकड़ी तस्करों के द्वारा जिस तरह से पेड़ों की कटाई कर चोरी की जा रही है उससे जंगली जानवरों का वहां से भागना तय है। वन विभाग के अधिकारी अपने दफ्तर से बाहर निकलकर जंगलों में झांकना जरूरी नहीं समझते। मैदानी अमले का आलम यह है कि उन्हें स्थानीय लोगों का भी अपेक्षित समर्थन प्राप्त नहीं है। ग्राम सुरक्षा समिति, वन सुरक्षा समिति, समूह का गठन यह सब एक औपचारिकता बनकर रह गया है। वन कर्मचारियों, मैदानी अमले, वन अधिकारियों और ग्रामीणों के बीच तालमेल का अभाव साफ तौर पर इस घटना से देखने को मिल जाता है। ग्रामीणों को सुरक्षा संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित कराने में भी कहीं न कहीं घपला हुआ है। डीएमएफ जैसे भारी-भरकम मद वाले आकांक्षी जिले के श्रेणी में शामिल कोरबा में करोड़ों- अरबों रुपए रहते हुए भी सिर्फ कंक्रीटो का जाल बेवजह और खंडहर में तब्दील करने के लिए खड़ा किया जा रहा है और जो जरूरतमंद लोग हैं उन तक योजनाएं क्रियान्वित नहीं की जा रही हैं।

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