0 सरकारी से कम दर पर डाला रेत का टेंडर और की आपूर्ति, बिना रॉयल्टी पर्ची के करीब 4 करोड़ का भुगतान से उपजे अनेक सवाल

कोरबा-कटघोरा, (खटपट न्यूज़)। कटघोरा वनमंडल क्षेत्रांतर्गत विभिन्न रेंज में कराए गए निर्माण कार्यों में उपयोग में लाई गई रेत और इसके आपूर्तिकर्ता ठेकेदार को किया गया लगभग 4 करोड़ का भुगतान अनेक सवालों को जन्म दिए हुए हैं। रायल्टी की चोरी कर नदी, नालों की रेत स्थानीय लोगों से प्राप्त कर निर्माण में खपाई गई और सरकारी से भी कम दर पर डाला गया टेंडर के अनुसार आपूर्तिकर्ता ठेकेदार ने अपनी राशि भी बड़ी आसानी से प्राप्त कर ली। पूरी व्यवस्था पर स्थानीय ठेकेदारों ने भी दबी जुबान में सवाल उठाए हैं।
सूत्रों से प्राप्त जानकारी के मुताबिक कटघोरा-पेण्ड्रारोड रेल कॉरिडोर व्यपवर्तन योजना के अंतर्गत इस रेल लाइन में आने वाले जंगल और वन्य प्राणियों के लिए भोजन-पानी की प्रभावित हो रही व्यवस्था को दुरूस्त करने के लिए 54 करोड़ रुपए की राशि केन्द्र सरकार से जारी हुई थी। कैम्पा मद के तहत एनीकट, तालाब आदि का निर्माण कार्य कराया गया। वनमंडल के पसान रेंज में 11 करोड़, जटगा रेंज में 26 करोड़, केंदई रेंज में 9.50 करोड़, एतमानगर रेंज में 3 करोड़, पाली रेंज में 12 करोड़, चैतमा रेंज में 7 करोड़ व काष्ठागार कसनिया में लगभग 2 करोड़ के कार्य कराए गए। उपरोक्त कार्यों में चोरी की रेत खपाने का मामला गर्म है। बताया जा रहा है कि 31 मार्च 2019 से लगातार रेत की रायल्टी रेत के आपूर्तिकर्ता ठेकेदार के द्वारा की जाकर उक्त निर्माण कार्यों में रेत खपाया गया। इतना ही नहीं बिना रायल्टी वाली रेत आपूर्ति का लगभग 4 करोड़ का भुगतान भी कटघोरा वनमंडल के द्वारा कर दिया गया जिसमें क्रय समिति के अध्यक्ष एसडीओ श्री तिवारी थे। वन मंडल के द्वारा विगत दिनों उपरोक्त योजनांतर्गत कार्य में 24 करोड़ रुपए का भुगतान किया गया जिसमें उक्त 4 करोड़ की राशि भी शामिल बताई जा रही हैं। बताया जा रहा है कि ठेकेदार द्वारा रेत खनन प्रतिबंध की अवधि से पूर्व निर्माण कार्यों के लिए रेत पहुंचाकर देना बताया गया है जबकि हकीकत में रेत स्थानीय लोगों से आपूर्ति कराया जाकर ठेकेदार ने अपना बिल पास करा लिया है। जल, जंगल और जमीन को खोदकर खनिज संपदा के रायल्टी की चोरी का यह मामला कटघोरा क्षेत्र के ठेकेदारों के मध्य काफी सुर्खियों में है और विभाग पर जांच व कार्यवाही की मांग उठी है।
दूसरी ओर अब वन विभाग के अधिकारी कह रहे हैं कि ठेकेदार ने कम दर भरकर रेत आपूर्ति की है तो नुकसान उसी का हुआ। उसे रॉयल्टी पर्ची जमा कराने कहा गया है। खनिज विभाग भी वन विभाग से खनिज रॉयल्टी के संबंध में कागजात मांगने की बात कर रहा है। फिर भी सवाल तो यही है कि नियम कायदे बने हैं तो पालन शुरू में ही क्यों नहीं कराया जाता? सब कुछ हो जाने के बाद होश में आना कहां का लॉजिक है? वैसे भी जंगल में मोर को नाचते हुए कब किसने देखा है, उसी तर्ज पर निर्माणकर्ता और आपूर्तिकर्ता के द्वारा गुणवत्तापूर्ण निर्माण सामग्रियों का उपयोग किया गया या नहीं, यह भी किसने देखा? कार्यपूर्णता का प्रमाण पत्र और फोटो लगाकर वारा-न्यारा कर बंदरबांट होने से इंकार नहीं किया सकता। बाहरी ठेकेदारों को सांठगांठ पूर्वक भुगतान हो रहा है और स्थानीय ठेकेदार आगे- पीछे चक्कर काटकर भी भुगतान नहीं निकलवा पा रहे हैं जो उचित कार्यशैली नहीं कही जा सकती। ऐसे मामलों में संबंधित अधिकारियों के प्रति शासन को सख्त रुख अपनाने की जरूरत है।
0 125 रुपए का टेंडर, 163.66 रुपए सरकारी दर…फिर कैसे संभव?
स्थानीय सूत्रों ने बताया कि रेत आपूर्तिकर्ता दीगर जिले के ठेकेदार ने 125 रुपए प्रति घन मीटर की दर से रेत आपूर्ति का टेंडर पास कराया और निर्माण स्थलों पर चाहे वह कितनी भी दूर क्यों न हों, वहां आपूर्ति होना बताया है। दूसरी तरफ सरकारी दर के अनुसार प्रति घन मीटर रेत की कीमत 163.66 रुपए होती है और एक ट्रैक्टर में 3 घन मीटर रेत के मान से 491 रुपए की रायल्टी व 18 प्रतिशत जीएसटी अतिरिक्त जोड़कर बिलिंग होती है। इस तरह भरे गए टेंडर से कहीं ज्यादा की राशि सरकारी दर के अनुसार ही हो जाती है तब भला इतने कम दर पर रेत की आपूर्ति कैसे संभव हुई? आरईएस का एसओआर के मुताबिक 0 से 10 किलोमीटर के मध्य एक ट्रैक्टर रेत पहुंचाकर लगभग 1500 रुपए का खर्च अनुमानित है।















