
कोरबा (खटपट न्यूज)। विपक्ष के बायकॉट के बीच मंगलवार को सरकार ने लोकसभा में तीन विवादास्पद श्रम संहिताएं विधेयक यानी लेबर कोड बिल पास करा लिया वहीं बुधवार को राज्य सभा में भी इस विधेयक को पास करा लेने के बाद राष्ट्रपति के हस्ताक्षर का इंतजार है। राष्ट्रपति के हस्ताक्षर करते ही यह लेबर कोड विधेयक कानून का रूप ले लेगा।
क्रमश: औद्योगिक संबंध, सामाजिक सुरक्षा और पेशागत सुरक्षा तथा स्वास्थ्य एवं कामकाजी परिस्थितियों से जुड़ी विधेयक व मजदूरी संहिता विधेयक को पिछले साल ही संसद के दोनों सदनों से पास करा लिया गया था। श्रम कानूनों में सुधार की प्रक्रिया को तेज करने की बात कहकर 44 श्रम कानूनों को समाहित कर 4 संहिताओं में सूत्रबद्ध कर दिया गया है। इस संबंध में एटक के दीपेश मिश्रा ने कहा है कि सरकार ने लेबर कोड के माध्यम से श्रम कानूनों में जो बदलाव किए हैं उससे अभी मजदूरों, कर्मचारियों को मिल रही कागजी सुरक्षा पूरी तरह खत्म हो जाएगी। इससे लगभग देश की तीन चौथाई कंपनियों में बंधुआ मजदूरी प्रथा जैसे हालात बन जाएंगे वहीं अब 300 से कम संख्या वाली कंपनियों द्वारा इस विधेयक के माध्यम से साजिश रचकर हायर एंड फायर की नीति लागू कर कामगारों को मनमाने तरीके से निकालने और नौकरी पर रखने की खुली छूट मिल जाएगी। इसी तरह निजी कंपनियों के मालिकों को मनमर्जी कंपनी बंद करने की लेबर कोड में छूट दी गई है साथ ही साथ मजदूरों के काम के घंटे को भी 8 से बढ़ाकर 9 करने का लेबर कोड में प्रावधान किया गया है। लेबर कोड बिल में कर्मचारियों के हड़ताल पर पूरी तरह पाबंदी लगाई गई है वहीं ट्रेड यूनियन पंजीयन को भी जटिल बना दिया गया है ताकि श्रम संगठनों की संख्या को पूरी तरह सीमित किया जा सके। ट्रेड यूनियन कानून 1926 को भी पूरी तरह कमजोर कर दिया गया है ताकि श्रम संगठनों का वजूद ही समाप्त हो जाए जिसका श्रम संगठन विरोध कर रहे हैं। दीपेश मिश्रा ने कहा है कि सरकार ने सामाजिक सुरक्षा संहिता में सुरक्षा के दायरे में असंगठित क्षेत्र के सभी मजदूरों को लाने का दावा किया है लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट है क्योंकि इस बारे में कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं है।















