
कोरबा(खटपट न्यूूूज)। देश और प्रदेश सहित कोरबा जिले में कोरोना की रफ्तार बेकाबू होती जा रही है। आज तक की स्थिति में कोरबा जिले में कुल 763 पॉजिटिव केस, कुल डिस्चार्ज 569, कुल एक्टिव केस 188, सरकारी रिकार्ड के मुताबिक दर्ज हैं जििनमें 6 लोगों की मौत भी हुई है। पिछले 6-7 दिन के आकड़ों पर गौर करें तो 25 अगस्त से 1 सितंबर 2020 के मध्य ही अकेले कोरबा जिले में 140 पॉजिटिव मामले दर्ज हुए हैं।
एकबारगी लगने लगा था कि प्रवासियों का आना थम जाएगा तो कोरोना भी थमेगा लेकिन जिस तरह से मामले बढ़े हैं उससे हालात चिंताजनक होना लाजिमी है। लोगों से बच-बच कर दफ्तरों में काम करने वाले शीर्ष विभागीय अधिकारियों से लेकर कर्मचारियों, लोगों से ज्यादातर मेल-जोल नहीं रखने वाले न्यायाधीश, तहसीलदार, आईएएस अधिकारी, नो ट्रैवल वाले भी अब कोरोना की चपेट में आ रहे हैं। अभी जबकि कुछ ही प्रतिशत लोग सर्दी-जुकाम-बुखार होने पर ऐहतियातन अपनी जांच करा रहे हैं जबकि एक बड़ा वर्ग समूह किसी भी तरह की जांच से दूरियां बनाए हुए हैं और यदि सभी की जांच सिलसिलेवार करा दिए जाएं तो हालात का अंदाजा लगाया जा सकता है।
इन सबके बीच जब कोरोना बेकाबू हो रहा है, तब अनलॉक की प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए बाजार भी खोले जा रहे हैं। खुलते बाजार में लोग बेखौफ होकर घूम रहे हैं/खरीदारी कर रहे हैं। आवश्यक न होने पर भी पूरे परिवार को लेकर बाजार में निकल रहे हैं। एक दिन की खरीदारी में चार-पांच दिन और सूखे सामानों के मामले में महीने भर काम चलाया जा सकता है लेकिन हर दिन घर से निकलना, अनावश्यक रूप से बिना मास्क लगाए व सोशल डिस्टेंसिंग का उल्लंघन कर, गुटखा चबाते हुए, सड़क और बाजार में थूकते हुए गुजरना इनकी आदत में शामिल हो गया है। प्रशासन की लाख चेतावनी के बाद भी जहां लोग अधिकांश लोग समझदार नहीं हो रहे वहीं बाजारों व दुकानों में मास्क से लेकर सोशल डिस्टेंसिंग, सेनेटाइजर व पानी की टंकी रखने के भी निर्देश का किसी भी तरह से पालन होता नजर नहीं आ रहा।
कहीं न कहीं सख्त होते प्रशासन पर राजनेताओं और उनके संरक्षण वाले छुटभैये नेताओं के जरिये पड़ने वाला दबाव से शिथिल पड़े प्रशासन की यह मजबूर उदारता, नगर पालिक निगम के विभिन्न जोन और उसके अधीन व्यवस्था बनाने के लिए नियुक्त किए गए अधिकारियों व कर्मचारियों की उदासीनता/अनदेखी इस बेखौफपन की बड़ी वजह कही जा सकती है। कोरोना काल में निगम प्रशासन की कार्रवाई को भी व्यापारियों ने सवालों के घेरे में लाया क्योंकि एक भृत्य भी अधिकार मिलने पर अपने आप को अधिकारी से कम नहीं समझ रहा और उसकी बात न मानने पर भारी-भरकम चालान काटने में तनिक भी देर नहीं करता। इस तरह के रवैए से भी अनेक व्यापारियों में रोष है और प्रशासन को सहयोगात्मक रवैया नहीं मिल पा रहा। निचले स्तर के कर्मचारियों के ढीठपन के कारण प्रशासन की छवि भी बिगड़ रही है, तो जिन पर सख्ती बरतनी चाहिए और लॉकडाउन खुलने का समय खत्म होने के बाद अनावश्यक रूप से विचरण करने वालों पर कार्रवाई होनी चाहिए, उन्हें अभयदान मिलता है क्योंकि ऊपर से आदेश है। बिना सख्ती किये कोविड-19 के प्रोटोकॉल का पालन कराने के इस ऊपरी आदेश की आड़ में मनमानी जारी है। यह कहना कोई गलत नहीं होगा कि राजनैतिक दबाव, अपनी बात किसी भी सूरत में मनवाने की प्रवृत्ति के साथ-साथ प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों में आपसी सामंजस्य और तालमेल का कहीं न कहीं अभाव वर्तमान दौर में देखने को मिल रहा है वरना कोरोना के साथ-साथ पुुुलिस/ प्रशासनिक भय भी होता तो लोग इतने बेकाबू न होते और नियमों का उल्लंघन भी ना करते। खुली आंखों से देखे जाने वाले नियमों के उल्लंघन पर भी अनदेखी करना आम आवाम के लिए भारी पड़ सकता है, इसका भी ध्यान रखना होगा।

“वैसे भी विश्व स्वास्थ्य संगठन ने आज ही जारी अपनी चेतावनी में स्पष्ट किया है कि बढ़ते संक्रमण के बीच लॉकडाउन में ज्यादा छूट घातक हो सकती है। वायरस के महामारी के बीच लॉकडाउन को इतनी जल्दी खोलना तबाही का कारण बन सकता है। जाहिर है कि यह चेतावनी गैरजिम्मेदार लोगों के लिए ना सही पर जिम्मेदार लोगों के लिए डराने वाली है।”
















