Thursday, March 26, 2026
Home छत्तीसगढ़ बैलों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का त्यौहार है पोला/पोरा

बैलों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का त्यौहार है पोला/पोरा

गावेन्द्र

रायपुर(खटपट न्यूज़)। क्षेत्रफल की दृष्टि से छत्तीसगढ़ में देश का तीसरा सबसे बड़ा वन क्षेत्र है। छत्तीसगढ़ के कुल क्षेत्रफल का लगभग 44% हिस्सा वनों से ढका हुआ है। छत्तीसगढ़ देश के “मध्यम सघन वन” क्षेत्रों की श्रेणी में आता है। छत्तीसगढ़ के शेष क्षेत्रफल में बड़े पठार और मैदान हैं। इन इलाकों में ज्यादातर आबादी कृषि या कृषि आधारित अन्य व्यवसायों पर निर्भर है। इसीलिए छत्तीसगढ़ के लोक व्यवहार में वनों और कृषि का विशेष महत्व है।

छत्तीसगढ़ के ज्यादातर त्यौहार वनों या कृषि से संबंधित हैं। “भारत की आत्मा गांवों में बसती है”। महात्मा गांधी के इस कथन में आत्मा से आशय है हमारी संस्कृति, परंपराएं और रीति-रिवाज। प्राचीन काल से ही त्यौहार हमारे समाज का अभिन्न हिस्सा रहे हैं। छत्तीसगढ़ में लगभग 20000 गांव हैं, यह गाँव आज भी हमारी इस परंपरागत विरासत को प्रफुल्लित किये हुए हैं। छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाकों के अलावा शहरी आबादियों में भी यहां के हर परंपरागत त्यौहार को बड़े धूमधाम से मनाया जाता है।
पोला त्यौहार इनमें से एक महत्वपूर्ण त्योहार है। पोला भादो माह की आमावस्या के दिन मनाया जाता है। पोला छत्तीसगढ़ के अलावा महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश में भी मनाया जाता है। महाराष्ट्र में यह बैल पोला, मध्यप्रदेश में पोला और छत्तीसगढ़ में पोला या पोरा नाम से प्रचलित है।

पोला किसानों द्वारा मनाया जाने वाला त्यौहार है, छत्तीसगढ़ की शहरी आबादी भी प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से कृषि से जुड़ी है इसलिए यह त्यौहार शहरी क्षेत्रों में भी बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस त्यौहार के दो प्रमुख रिवाज़ हैं।
पहला: भादो माह की आमावस्या (अगस्त या सितंबर) आते-आते धान के पौधे लगभग एक फीट के हो जाते हैं। यह समय धान में दूध भरने का समय होता है, इसे धान की गोदभराई का समय भी कहा जाता है। किसान इस दिन अच्छी फसल के लिए अन्न की देवी माता अन्नपूर्णा की पूजा करते हैं। दंतकथाओं के अनुसार किसान देवी अन्नपूर्णा से कहते हैं कि हे देवी हमनें मिट्टी और औजारों की ठीक से पूजा कर अपने बीज रोपे हैं। आपकी कृपा से अच्छे पौधे निकल आए हैं। हे देवी आपसे हमारी यह प्रार्थना है कि आप हमारी फ़सलों की गर्भ भरकर अच्छी फसल का वरदान दीजिए। हरेली की तरह किसान इस दिन भी कृषि संबंधी कोई भी कार्य नहीं करते हैं। कई जगहों पर माता अन्नपूर्णा को प्रसन्न करने के लिए मुर्गे की बली भी दी जाती है।

दूसरा: इस दिन किसान कृषि में मित्रों की तरह साथ देने वाले अपने बैलों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। दुनिया की अलग-अलग सभ्यताओं में बैलों को देवताओं की तरह पूजे जाने के कई प्रमाण हैं। प्रेमचन्द की हीरा और मोती दो बैलों की कहानी हमारे लोक में बैलों के प्रति मानव प्रेम की मिसाल है।

भारत के लोक जीवन में प्राचीन काल से कृषि मुख्य व्यवसाय रहा है। नवाचार के इस दौर में भी भारत के ज़्यादातर किसान परंपरागत कृषि करते हैं। परंपरागत कृषि में बैल कृषक का सबसे बड़ा साथी होता है। छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहा जाता है, धान यहाँ की प्रमुख फसल है। धान की बुआई, बियासी, मींजाई और फ़सलों की ढुलाई का काम बैलों की मदद से किया जाता है। पोला के समय तक किसान कृषि कार्यो से मुक्त हो जाते हैं। अब फसल काटने तक वे खेतों की देख-रेख करेंगे।

हरेली के दिन से शुरू हुए कृषि कार्यों में बैल के योगदान के लिए कृषक पोला के दिन बैलों की पूजा करते हैं। सुबह से बैलों को धोकर उन्हें हरी घास और कई तरह के भोज खिलाए जाते हैं। बैल अपने कंधों के सहारे हल और बैलगाड़ी खींचते हैं, इससे उनके कंधे की त्वचा सख्त हो जाती है। इस पीड़ा से राहत के लिए बैलों के कंधों पर हल्दी और तेल का लेपन किया जाता है।

छत्तीसगढ़ के सभी त्यौहारों की तरह पोला भी सामूहिक रूप से मनाया जाने वाला त्यौहार है। इस दिन घर की महिलाएं कई तरह के परंपरागत पकवान बनाती हैं जैसे ठेठरी, खुरमी, अइरसा, अनरसा, भजिया पूड़ी इत्यादि। ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चे पोला को लेकर काफी उत्साहित होते हैं। पोला से लगभग एक सप्ताह पहले ही बाजारों में लकड़ी और मिट्टी के बैल, मिट्टी के बर्तन, और अन्य खिलौने सजने लगते हैं। लड़के अपने लकड़ी और मिट्टी के बैलों से दिन भर खेलते हैं, वहीं लड़कियां पोरा-जांता (मिट्टी से बने बर्तन और चक्की) से खेलती हैं। किसान अपने बैलों को रंगों और कपड़ों से सजाकर गांव के बड़े मैदान में इकट्ठा होते हैं। लोग एक दूसरे से मिलकर पोला की बधाई देते हैं। कुछ गांवों में पोला उत्सव मनाए जाते हैं। यहां बैलों की प्रदर्शनी लगाई जाती है, कुछ जगहों पर बैलों की दौड़ का भी आयोजन किया जाता है। इस दौड़ में जीतने वाले बैल के मालिक को पुरस्कृत किया जाता है।

छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले का मडियापार यहां होने वाले बैलों की दौड़ के लिए देश भर में जाना जाता है। छत्तीसगढ़ के अलावा गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश सहित कई राज्यों के बैल इस प्रतियोगिता में भाग लेने आते हैं। बैलों की दौड़ के बाद शाम के समय कबड्डी, फुगड़ी, खो-खो सहित कई खेलों की प्रतियोगिता होती है। देर शाम सांस्कृतिक कार्यक्रमों की प्रस्तुति के साथ यह उत्सव समाप्त होता है।

Advertisement Carousel