कोरबा(खटपट न्यूज़)। महिला एवं बाल विकास विभाग के अधिकारियों की नाक के नीचे से प्रबल योजना की राशि में 50% की कमीशनखोरी हो गई और भनक तक नहीं लगी। अनेक पर्यवेक्षकों (सेक्टर सुपरवाइजरों) ने यह कमीशन की राशि आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के निजी खाते में जमा की गई प्रबल योजना की राशि में से निकलवा कर प्राप्त कर लिया है और कई सुपरवाइजर इसके लिए ताक में बैठे हैं।

महिला एवं बाल विकास विभाग के द्वारा सरकार की मंशा अनुरूप एवं कमजोर बच्चों से लेकर शिशुवती माताओं व गर्भवती महिलाओं को सुपोषण देने के लिए अंडा,केला व अन्य पोषण सामग्री का वितरण प्रबल योजना के तहत कराया जा रहा था। योजना में कभी विभाग के द्वारा अंडा,केला प्रदाय कर वितरण कराया जाता रहा तो फिर बाद में विभाग ने इसे बंद करके आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को जिम्मा दिया कि वे अपने से रुपए खर्च कर अंडा, केला व अन्य निर्धारित पौष्टिक सामग्री का वितरण हितग्राही को करें। खर्च की गई राशि का भुगतान के संबंध में बिल बनवा कर जमा कराया गया था। कार्यकर्ताओं को कहा गया था कि खर्च की राशि का भुगतान जल्द ही उन्हें कर दिया जाएगा किंतु काफी लंबे समय से इसका इंतजार हो रहा था। वर्ष 2020-21 के अक्टूबर-नवंबर-दिसंबर माह की प्रबल योजना की राशि का भुगतान आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के खाते में अब जाकर किया गया। यह राशि विगत 2 से ढाई महीने के भीतर कार्यकर्ताओं के खाते में सीधे जमा कराई गई जो कि उनके द्वारा किए गए खर्च का भुगतान है। ग्रामीण क्षेत्रों के कार्यकर्ताओं के खाते में पहले भुगतान आया, इसके बाद शहरी के। कार्यकर्ताओं के खातों में जमा हुई प्रबल योजना की राशि में भी कमीशनखोरी शुरू कर दी गई है। ग्रामीण क्षेत्र की कार्यकर्ताओं के हवाले से जानकारी मिली है कि लगभग 2 महीना पहले उनकी सुपरवाइजर ने सेक्टर के सभी आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं से उनके खाते में जमा हुई प्रबल की राशि में से 50 प्रतिशत राशि निकलवा कर प्राप्त कर ली है। बड़ी सफाई से यह कार्य कराया गया।कार्यकर्ताओं को कई तरह से अप्रत्यक्ष दबाव में लेकर अन्यान्य जगहों में बुलाकर राशि प्राप्त कर ली गई। पीड़ित कार्यकर्ताओं में मन ही मन इस बात को लेकर कसक जरूर है कि कार्यकर्ताओं के द्वारा खर्च की गई राशि में भी कमीशनखोरी की जा रही है। अब प्रबल योजना में जो राशि कार्यकर्ताओं ने अपने जेब से खर्च की है, उसका जब विभाग ने भुगतान कर दिया तो उसमें भी कमीशन, वह भी 50% लिया जाना कहां तक जायज है? कुछ कार्यकर्ताओं ने इसका विरोध तो किया लेकिन उनकी बात अनसुनी कर दी गई और कहा गया कि अधिकारियों को देना है। दूसरी ओर कमीशन भुगतान कर चुकी कार्यकर्ताओं ने जब अपने माध्यम से पता करवाया तो मालूम हुआ कि इस तरह के कमीशनखोरी की भनक परियोजना स्तर के अधिकारियों को भी नहीं है, जिला स्तर की बात तो दूर।यानी कुल मिलाकर अभी तक सुपरवाइजरों ने अपने हिसाब से गणित लगाकर अपने-अपने सेक्टर से कम से कम 50 से 70 हजार रुपये तक की वसूली कर ली।
मजे की बात तो यह है कि कुछ सुपरवाइजर ने बड़ी सफाई से इसे अंजाम दे दिया है तो अनेक लोग इस राह पर चलने के लिए तत्पर हैं।आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का कहना है कि जिस योजना और कार्य में कमीशन देना संभव हो पाता है, वह तो देते ही आ रहे हैं लेकिन अब हर बात में कमीशन मांगने की नौबत आ गई है तो क्या आने वाले दिनों में मानदेय बनाने में भी कमीशन देना होगा? दबाव की रणनीति काफी गहरे तक पैठ बनाए हुए है जिससे कार्यकर्ता अपनी नौकरी के भय से मुंह खोलने में डरती हैं। इसी डर की आड़ में कमीशन वसूलने का रास्ता बनाया जा रहा है।















