जंगल में जुआ रोकने कानून हाथ में लेते ग्रामीण, क्या पुलिस पर भरोसा नहीं या सरपंच के कंधे से चलाई जा रही बन्दूक….?

00 सत्या पाल 00
कोरबा(खटपट न्यूज़)। कोरबा जिले के जंगल इन दिनों सुर्खियों में हैं। इसकी वैसे तो कोई एक वजह नहीं लेकिन जिस तरह जो कुछ भी हो रहा है, किया अथवा पर्दे के पीछे से कराया जा रहा है, वह शांति व्यवस्था के लिए कतई उचित नहीं कहा जा रहा। शहर से लेकर गांव तक हर मामले का होता राजनीतिकरण और स्वार्थ के लिए दखलंदाजी अमन-चैन की सेहत के लिए खतरा ही कहा जायेगा।

वर्तमान में अपना काम निकालने की प्रवृत्ति इस कदर हावी हो गई है कि सामने वाले को बातों में उलझाकर उसका कब इस्तेमाल कर लेंगे यह उसे पता नही चल पाता। प्रतिद्वंदिता हर क्षेत्र में है पर इसे जाहिर करने के अपने तरीके हैं। उरगा थाना क्षेत्र के लबेद पंचायत के रामभाठा-तुमान के जंगल की जो बात सामने आ रही है, वह एक पहले से लिखी गई स्क्रिप्ट है जिसे अकेले सरपंच के बूते फिल्माया गया। लबेद की सरपंच महिला है, उसके साथ महिला समूह और ग्रामीणों का साथ होना बताया व दिखाया जा रहा है किंतु शिकायतकर्ता एकमात्र सरपंच है। अमूमन जब समस्या सामूहिक हो तो आवेदन/शिकायत करने वाला कोई एक नहीं होता और साबित करने सामूहिक हस्ताक्षर भी होते हैं। सरपंच के एकल हस्ताक्षर का आवेदन वह भी लाकडाउन में जिला मुख्यालय तक पहुंचना, जब कलेक्ट्रेट में बाहरी लोगों का प्रवेश वर्जित है तब पावती लेना फिर दूसरे ही दिन बिना पुलिस का सहयोग लिए खुद ही चंद लोगों का जंगल में धमक जाना.. जहाँ न जाने किस प्रयोजन से कुछ लोग एकत्र हैं, उनकी मंशा जाने बगैर उन पर बरस पड़ना फिर खुद ही फैसला सुना देना अपने आप में बता रहा है कि यह प्रायोजित कार्यक्रम था। किसी न किसी तरह से चंद ग्रामीणों को इकट्ठा करवाकर किसी ने अपना न जाने कौन सा स्वार्थ साधने गांव के माहौल को बिगाड़ने के साथ पुलिस की कार्यशैली पर भी सवालिया निशान लगवाए हैं? पुलिस अधिकरियों की मानें तो वे छपामार कार्यवाही करते रहते हैं और जुआ पकड़े भी गए, तब ग्रामीणों का आरोप दरकिनार हो जाता है। इसके बाद भी जंगल में जुआ रोकने के लिए कानून हाथ में लेते ग्रामीणों को क्या पुलिस पर भरोसा नहीं है या फिर सरपंच के कंधे से अपने स्वार्थ के लिए बन्दूक चलवाने का काम किया है।

बेशक, गलत बात का विरोध होना चाहिए पर गलत बातों का सिलसिला तुमान, रामभाठा में ही नहीं बल्कि पूर्वांचल से पश्चिमांचल तक है किंतु इस तरह का विरोध एक ही जगह होना सवाल तो उठाता है। एक बार मान लें कि यहां के ग्रामीण जागरूक हैं किंतु जुआ की बातें इस इलाके में साल-छह महीने से सुनाई पड़ रही हैं, तो ग्रामीण नींद में क्यों रहे जब यहां कथित तौर पर 200-250 लोग इकठ्ठा रहते रहे? जमीर का जागना और उसे जबरजस्ती हवा देकर जगाना, दोनों में फर्क है। पंचायत प्रतिनिधियों को चाहिए कि वे अपने पंचायत क्षेत्र में सजग और जागरूक होकर काम करें, किसी की बातों और बहकावे में आकर कदम उठाना/मोहरा बनना जायज नहीं। ग्रामीण जनता ने उन्हें पंचायत का विकास के लिए अपना प्रतिनिधि चुना है न कि किसी का मोहरा बनने के लिए। देखना है कि जंगल के नाम पर जिले के अमन-चैन में खलल डलवाने वालों की कोशिशों और अपने ऊपर लगातार लगते आरोपों को पुलिस अधिकारी किस हद तक रोक पाने में कामयाब होंगे? हालांकि एएसपी कीर्तन राठौर ने शिकायतों पर संज्ञान लेने और कार्यवाही की बात कही है।

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