रामसागर पारा तालाब की घटना सबक भी-आईना भी, सरोवर-धरोहर योजना को लग रहा पलीता….

0 कुशल गोताखोर अशोक की 8 दिन बाद मिली जुलकुंभियों में उलझी लाश

रामसागर पारा का तालाब

कोरबा (खटपट न्यूज)। कोरबा निगम क्षेत्र के वार्ड क्र.-1 अंतर्गत रामसागर पारा तालाब में 2 लोगों के डूबने और इनके शव निकालने की हुई जद्दोजहद आखिरकार 8 दिन बाद सफल हुई। पहले डूबे युवक कमल गोंड़ का शव घटना के 2-3 दिन बाद बरामद कर लिया गया जबकि कमल की तलाश में तालाब में उतर कर डूबे कुशल गोताखोर अशोक नायडू की लाश 8 दिन बाद सोमवार को बरामद हुई। यह जिले की पहली घटना है जब तालाब में डूबे किसी शख्स का शव निकालने में 7 से 8 दिन लगे हों।
रामसागर पारा तालाब की यह घटना सबक भी है और आईना भी। अतिक्रमण कर तालाबों का दायरा घटाने और उसमें कचरा, सिवरेज व निस्तार का पानी एवं गंदगी बहाकर दलदली करने वालों के लिए यह घटना सबक है। दूसरी ओर सरोवर रूपी जल प्रदाता धरोहरों की देखरेख व इसकी नियमित साफ-सफाई करवाकर, अतिक्रमण को हतोत्साहित कर कम से कम निस्तारी के लायक ही उपयोग हेतु बनाये रखने में लापरवाही बरतने वाले प्रशासनिक मैदानी अमले व जिम्मेदार अधिकारियों की उदासीनता को आईना भी यह घटना दिखाती है। ऐसी घटना की पुनरावृत्ति न हो और तालाब की ऊंची-ऊंची झाड़ियों एवं दलदल में फिर कोई इस तरह कई दिनों तक न उलझा रहे, इसके दृष्टिगत सभी तालाबों की सफाई की जरूरत बन पड़ी है।

8 वें दिन मिली गोताखोर अशोक नायडू की लाश

0 निगम क्षेत्र में ही करीब 57 सरकारी तालाब
वर्तमान में कोरबा निगम क्षेत्र सहित जिले के अधिकांश तालाब खत्म होने की कगार पर हैं। या तो वे सूख चुके हैं या उन पर छोटे-बड़े मकान खड़े कर दिए गए हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि तालाबों की हत्या की जा रही है। कचरों और अतिक्रमण के तले दबकर तालाब चीख रहे हैं, लेकिन उनकी सुनने वाले जिम्मेदार विकास की बेतुकी इबारत पढ़ाने पर तत्पर हैं। सूत्रों के मुताबिक अकेले नगर निगम क्षेत्र में ही लगभग 57 सरकारी तालाब कागजी रिकार्ड में दर्ज हैं। धरातल पर कई तालाब अपना अस्तित्व खो चुके हैं तो कई अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। तालाबों को जमींदोज होने से बचाने के लिए सिर्फ सरकारी महकमे पर ही निर्भरता नहीं बल्कि जनसहभागिता और तालाब क्षेत्र के आसपास के रहवासियों के संयुक्त प्रयास की जरूरत है। यदि अपने-अपने क्षेत्र के ही तालाब का संरक्षण के जिम्मेदारी उस वार्ड अथवा मोहल्ले के लोग उठा लें तो भी तालाबों की किस्मत संवर जाएगी। इस मामले में कटघोरा का राधा सागर तालाब एक नजीर भी है।

0 करोड़ों खर्च फिर भी कई तालाब बदहाल

कोरबा के मुड़ापार तालाब का सौंदर्यीकरण और गहरीकरण पिछले वर्षो में सरोवर-धरोहर योजना के तहत किया गया था। इस पर दो करोड़ रूपए की राशि अकेले नगर निगम ने खर्च की। तालाब का गहरीकरण कराया गया। इसके किनारों में रिर्टनिंगवॉल बनायी गई और आसपास लाईट लगाई गई। यह आकर्षण बहुत दिनों तक नहीं टिक सका। अब यहां अवशेष बचे हैं। तालाब के कुछ हिस्से में ही पानी की मात्रा रह गई है। काशीनगर क्षेत्र के एक तालाब का गहरीकरण पूर्व कलेक्टर आरपीएस त्यागी के समय हुआ था। वर्तमान में यह भी उपयोग के लायक नहीं रह गया है। खपराभट्टा क्षेत्र का तालाब भी यही कहानी बयां कर रहा है। रामसागर पारा और राताखार के तालाबों का हाल भी कुछ ऐसा ही है। पोड़ीबहार के तालाब की साफ-सफाई के लिए श्रमदान होते रहते हैं। यहां सरकारी स्तर पर संसाधन भी जुटाये गए, गनीमत है कि यहां पानी तो है लेकिन घाट के आसपास गंदगी होने के कारण लोग आसानी से निस्तार के लिए दिलचस्पी नहीं लेते। कोरबा में संजय नगर और लक्ष्मणबन इलाके के तालाबों की दशा सहज ही देखी जा सकती है। वार्ड के पार्षद ने लक्ष्मणबन तालाब को संवारने के लिए अपने स्तर पर प्रशासनिक महकमे से काम कराने की कोशिशें की किंतु नतीजा शून्य है। जो तालाब कभी 10-12 साल पहले तक लोगों की प्यास बुझाने के साथ उनकी निस्तार संबंधी जरूरतों को पूरा करते रहे, वे अब सिवरेज और नाला के पानी, जलकुंभी सहित अनेक जलीय झाड़ियों, ठोस अपशिष्ट को समेटने का जरिया बनकर रह गए हैं। ये हालात तब हैं जब खासकर सरकारी तालाबों के संरक्षण और उनके संवर्धन के लिए संवैधानिक/कानूनी प्रावधान भी हैं।

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