मुआवजा का रोड़ा, दीपका खदान विस्तार के लिए जमीन का संकट, खदान बन्द होने के कगार पर….!

कोरबा, गेवरा-दीपका (खटपट न्यूज़)। एसईसीएल की दीपका खदान में उत्खनन के लिए अब कुछ ही महीने का कोयला बचा हुआ है जिसके लिए दीपका के उच्च अधिकारियों की चिंता की लकीरें बढ़ती ही जा रही है। आगे नियमित रूप से कोयला उत्पादन जारी रखने दीपका प्रबंधन ने प्रशासन से गुहार लगाई है।

खदान विस्तार के लिए नए अधिग्रहित भूमि पर प्रबंधन का आधिपत्य नहीं होने इसका मुख्य कारण माना जा रहा है। मुआवजा वितरण प्रक्रिया पेंडिंग होने से ग्रामीणों में रोष व्याप्त है। यही वजह है ग्रामीण कोयला अधिकारियों को उत्पादन आगे बढ़ाने रुकावट कर रहे हैं, जिससे दीपका प्रबंधन की चिंता की लकीरें और ही बढ़ती जा रही है। गंभीर समस्या से निपटने के लिए दीपका प्रबंधन प्रशासन से बार-बार स्थाई समाधान के लिए गुहार लगा रहा है जिससे आगे कोयला उत्पादन हो सके। इधर दीपका महाप्रबंधक ने कहा हैै कि अगर जमीन नहीं मिली तो 7-8 महीने के बाद कोयला उत्पादन पूरी तरह बंद होकर ठप पड़ जाएगा । दीपका में कोल प्रोडक्शन से जुड़े अन्य कई व्यवसाय भी इससे प्रभावित होंगे।
0 अमगांव क्षेत्र में मुसीबत, खास सहयोग नहीं मिल रहा कंपनी को
कोरबा जिले के कटघोरा अनुविभाग के अंतर्गत आने वाले अमगांव क्षेत्र में एसईसीएल ने विस्तार की योजना पर काम किया है। भूमि अधिग्रहण के साथ मुआवजा लेने का काम पूरा कर लिया गया है। पुनर्वास के विकल्प स्पष्ट कर दिये गए हैं। इसके साथ ही पात्रता के आधार पर रोजगार की जानकारी सार्वजनिक की जा चुकी है। प्रबंधन के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द अमगांव का एक प्राचीन मंदिर बना हुआ है। लोग इसे हटाने को तैयार नहीं हैं। उन्होंने सभी खातेदारों को नौकरी देने की मांग की है। कई तरह के तर्क लोगों की ओर से दिए जा रहे हैं। अब तक की स्थिति में इस धर्मस्थल को हटाने के लिए जो प्रयत्न किये गए वे नाकाम रहे। कंपनी के एक अधिकारी का कहना है कि हम इसी संरचना में दूसरा विकल्प देने को तैयार हैं। सभी सुविधाएं दिए जाने की बात कही गई है लेकिन सब कुछ बेनतीजा। राज्य शासन से जितना सहयोग अपेक्षित है उसका अभाव इस मामले में साफ तौर पर नजर आ रहा है, इसलिए कंपनी की चुनौती बढ़ रही है।
0 ढुलमुल रवैय्या बढ़ाता रहा है आक्रोश
बता दें कि खदानों के प्रारम्भ और विस्तार के लिए जमीन अधिग्रहण उपरांत एसईसीएल अपने वादे के अनुसार मूलभूत सुविधाएं मुहैया कराने में ढुलमुल रवैय्या अपनाता रहा है। मुआवजा, नौकरी, बेहतर पुनर्वास से लेकर अन्य सुविधाओं व समस्याओं के निराकरण में लेट-लतीफी और उदासीनता की कार्यशैली ने प्रबंधनों के प्रति भू-विस्थापितों में आक्रोश भड़काने का ही काम किया है। दीपका ही नहीं बल्कि दूसरी कोयला परियोजनाओं में भी चंद अधिकारियों की हठधर्मिता, दलालों के साथ मिलकर अनेक वास्तविक भू-विस्थापितों के हक पर कुठाराघात करते हुए फर्जी लोगों को मुआवजा से लेकर नौकरी का त्वरित लाभ दिलाने तथा हर स्तर पर संरक्षण की कार्यशैली नाराजगी की वजह है। यह एक बड़ा कारण है कि पूर्व के कडुवे अनुभवों से वाकिफ भू-विस्थापित अपनी शर्तों से कम पर मानने और प्रबंधन पर भरोसा करने को तैयार नहीं हैं जिससे जमीन हासिल करने के साथ ही उत्पादन और समय-समय पर प्रदर्शन- आंदोलन का संकट बन रहा है।

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