कोरबा(खटपट न्यूज़)। राजस्व संबंधी कामकाज के लिए किसी भी तरह के रुपए की मांग नहीं करने के आरोपों को जहां समय-समय पर राजस्व अमले से जुड़े लोग दरकिनार करते रहे हैं वहीं आए दिन इस तरह की शिकायतें भी सामने आती हैं कि विभिन्न काम के संबंध में पटवारियों द्वारा रुपए मांगे जा रहे हैं। पिछले दिनों हुई एक शिकायत पर अभी तक कार्यवाही लंबित है वहीं दूसरी ओर करतला ब्लॉक के ही सरईडीह हल्का नंबर 8 के पटवारी पर 20 हजार रुपये रिश्वत मांगने का आरोप लगा है। ग्राम पुरैना मड़वारानी के रहने वाले लखन लाल साहू को जमीन पंजीयन कराने के लिए अपने निजी भूमि की चौहद्दी बनवानी है। इसके लिए वह पटवारी के पास गया तो 20 हजार रुपये की मांग चौहद्दी बनाने के लिए की गई। लखनलाल साहू ने कलेक्टर से इसकी शिकायत करते हुए उचित कार्यवाही एवं चौहद्दी बनवाने की मांग प्रशासन से की है। देखना यह है कि प्रकरण में लखनलाल साहू को कब तक न्याय मिल पाता है।
यहां लगातार सामने आने वाली शिकायतों के बीच यह भी एक गंभीर सवाल है कि यदि राजस्व अमला निष्पक्ष तरीके से और बिना कोई मांग किये अपना कार्य अंजाम देते आ रहा है तो जमीनों के नामांतरण, बंटवारा, सीमांकन सहित इससे जुड़े अन्य तरह के कार्यों में आम जनता को खासकर ग्रामीण क्षेत्र के किसानों, निजी भूमि स्वामियों को बार-बार चप्पल क्यों घिसनी पड़ती है?निजी जमीन का सीमांकन कराने के लिए निम्न से लेकर मध्यमवर्ग तक के लोगों को बार-बार चक्कर पर चक्कर काटना पड़ता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि बिना चढ़ावा दिए कोई भी काम संभव नहीं, भले ही राजस्व विभाग से जुड़े लोग इसे दरकिनार करते हों। अगर यह बात गलत है तो क्यों बार-बार उनकी दहलीज पर चढ़ना पड़ता है? क्या शिकायतकर्ता बिना किसी पीड़ा के ही शिकायत करके अपना वक्त बर्बाद करता है या शिकायतकर्ता को बेवजह की शिकायत करने में मजा आता है! क्या कभी किसी धनाढ्य अथवा पहुंच वाले व्यक्ति को इस तरह की शिकायत करते पाया गया है ? पिसने का काम सिर्फ मध्यम और गरीब वर्ग को ही करना पड़ता है। निस्संदेह व्यवस्था से पीड़ित और सताया हुआ व्यक्ति ही शिकायत की दहलीज पर चढ़ता है।
निस्संदेह व्यवस्था से पीड़ित और सताया हुआ व्यक्ति ही शिकायत की दहलीज पर चढ़ता हैयदि सारे कार्य समय सीमा में व्यवस्थाओं के तहत होने लगे तो शिकायत की नौबत ही ना आए। फौती नामांतरण, नामांकन, सीमांकन, बटांकन, सामान्य नामांतरण के अनेक कार्य वर्षों से लंबित पड़े हैं। भले ही मुख्यमंत्री से लेकर कलेक्टर तक के द्वारा बैठक लेकर बार-बार निर्देश दिए जाते हैं लेकिन हर बार के दिए निर्देश हवा में ही गुम हो जाते हैं। इस बात को जिम्मेदार अधिकारियों को भी गंभीरता से समझना होगा।
गौरतलब है कि कुछ इसी तरह के मसलों को लेकर पिछले दिनों रायगढ़ जिले में तहसीलदार और वकीलों के बीच विवाद हुआ था जिसकी आंच में पूरा प्रदेश झुलसा है। यह भी विचारणीय तथ्य है कि जिस किसी राजस्व संबंधी मामले में जांच की बात हुई हो अथवा एफआईआर दर्ज कर पुलिस द्वारा विवेचना की जा रही हो, उसमें राजस्व विभाग का सहयोग मिलने की बजाय दबाव बनाकर मामलों को रफा-दफा करने की भी कोशिशें होती आई हैं। मामलों में पुलिस के साथ समन्वय स्थापित नहीं करने के कारण अनेक प्रकरण फाइलों में दबे हुए हैं और ऐसे दबे हुए जितने भी प्रकरण हैं वह सभी कहीं ना कहीं रसूखदारों से जुड़े हुए हैं वरना किसी गरीब का मामला हो तो उसे तत्काल सलाखों के पीछे जाना पड़ जाता है और संपूर्ण राजस्व अमला मिलकर जांच में सहयोग करता है किंतु रसूख वाले मामलों में भगवान ही मालिक है।

00 सत्या पाल 00 (7999281136)














